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Saturday, 25 March 2017

मनहुस व्यक्ति - तेनालीरमन की कहानियां

राजा कृष्णदेव राय के समय की बात है. उनके राज्य में सुखदेव नाम का एक आदमी रहता था. सुखदेव के बारे में पूरे राज्य में एक बात फैली हुई थी कि सुबह-सुबह जो भी उसका मुंह देख लेता है, उसे पूरे दिन खाना नसीब नहीं होता. उड़ती-उड़ती यह बात महाराज कृष्णदेव राय के कानों तक भी पहुंची.

महाराज ने सोचा कि यदि ऐसा सचमुच है तो इस मामले की जांच करनी चाहिए. यही सोचकर उन्होंने सुखदेव को बुलवाया और रात में खूब खातिरदारी करके अपने कक्ष में ही उसका बिस्तर लगवा दिया.
अगले दिन महाराज सुबह उठे और सुखदेव का चेहरा देखा. उसके हालचाल पूछे, फिर अपने रोजाना के कामों में व्यस्त हो गए. किसी काम में ऐसे उलझ गए कि उन्हें नाश्ता करने का वक़्त ही न मिला.
खैर दोपहर हो गई और महाराज के सामने भोजन परोसा गया, लेकिन उनके महल में कोई ऐसी अप्रिय घटना घटी कि उन्हें परोसा हुआ खाना छोड़कर जाना पड़ा. शाम तक इसी तरह कुछ न कुछ होता रहा और उस दिन महाराज को खाना खाने का वक़्त नहीं मिला. तब महाराज ने सोचा कि यह इंसान वाकई मनहूस है, आज सुबह इसका चेहरा देखा था और आज पूरे दिन मुझे भोजन नसीब नहीं हुआ.
उन्होंने तुरंत सिपाहियों को बुलाया और सुखदेव को फांसी चढ़ाने का आदेश दिया. जब यह खबर तेनालीराम के कानों तक पहुंची तो वे निर्दोष सुखदेव के पास पहुंचे और बोले यदि तुम्हें अपनी जान बचाना है तो जैसा में कहता हूँ वैसा ही करना. सुखदेव ने कहा- जी आप जैसा कहेंगे मैं वैसा ही करूंगा.”
तेनालीराम ने सुखदेव के कान में कुछ कहा और वहां से चले गए. शाम को दरोगा आए और सुखदेव से बोले – “महाराज का आदेश है कि यदि तुम्हारी कोई आखिरी इच्छा हो तो कहो, जरूर पूरी की जाएगी.”
सुखदेव बोला- “दरोगा जी, मैं सारी प्रजा के सामने यह बात कहना चाहता हूं कि मैं मनहूस हूं. जो मेरा चेहरा देख लेता है, उसे भोजन नसीब नहीं होता, मगर महाराज मुझसे भी बड़े मनहूस हैं, मैंने आज सुबह उनकी शक्ल देखी और शाम को मुझे फांसी चढ़ना पड़ रहा है. जाओ दरोगा जी यही मेरी आखिरी इच्छा है.”
दरोगा ने यह बात जाकर महाराज को बताई. दरोगा की बात सुनकर महाराज को अपनी भूल का एहसास हुआ और उन्होंने फांसी की सजा रद्द कर दी.
सिपाही उसे लेकर आए तो महाराज ने उसे सम्मान सहित अपने पास बैठाया, फिर बड़े ही प्यार से पूछा – “सच बताना सुखदेव यह बात तुम्हें कैसे सूझी ?”
सुखदेव ने कहा – “महाराज, तेनालीराम ने मुझे ये तरीका सुझाया.”